hindisamay head


अ+ अ-

विमर्श

मिथकों में स्त्री अस्मिता और भीष्म साहनी

सुप्रिया पाठक


स्त्री विमर्श उत्तर औपनिवेशिक विमर्श के दौर में उपजा एक गंभीर अकादमिक एवं सैद्धांतिक विमर्श है जिसने स्त्रियों के इतिहास को अपने प्रस्थान बिंदु के रूप में अपनाया है एवं ऐतिहासिक विश्लेषण के क्रम में जेंडर को एक श्रेणी के रूप में देखने की आवश्यकता को स्थापित किया है। भारत के इतिहास में स्त्रियों के इतिहास को तलाशने के लिए अत्यंत कम सामग्री उपलब्ध है। ऐसी स्थिति में साहित्य की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि साहित्य सिर्फ सामाजिक यथार्थ का प्रस्तुतीकरण ही नहीं करता, बल्कि एक राजनीतिक भूमिका भी निभाता है। अपने कथानक, पात्रों, शिल्प विधान, सांकेतिक प्रस्थापनाओं के माध्यम से साहित्य ने हमेशा समकालीन सामाजिक, सांस्कृतिक एवं राजनैतिक परिस्थितियों के प्रति अपना हस्तक्षेप दर्ज किया है। हालाँकि उसने अपनी साहित्यिक भूमिका की सीमाएँ भी तय की हैं। बावजूद इसके, सामान्य जनमानस में उसकी स्वीकार्यता निर्विवाद है। स्त्रियों का जीवन, उनकी उम्मीदें और सपने, सामाजिक यथार्थ के अनुरूप उनकी परवरिश और आदर्श स्त्री बनने का पूरा ताना बाना हमारे आस पास मौजूद साहित्य, लोक कथाएँ, कहानियाँ, लोक गीत और किंवदंतियाँ गढ़ा करती हैं जिससे समाज में स्त्रियाँ अपना रूप ग्रहण करती हैं। प्रसिद्ध फ्रांसीसी विचारक सिमोन के शब्दों में कहें तो - "स्त्री पैदा नहीं होती, बल्कि बनाई जाती है।" इस आलेख के केंद्र में वे प्रवृत्तियाँ हैं जिन्होंने न सिर्फ स्त्री को गढ़ा बल्कि उसके मानक भी तय किए। विशेष तौर पर, हिंदी के प्रमुख लेखकों ने उसे अपनी रचनाओं में उतारा। उन्हीं में से एक रहे भीष्म साहनी। भीष्म साहनी (1915 -2003) ने अपने रचना कर्म में न सिर्फ सही सोच का निर्माण किया, बल्कि उसमें सामान्‍य पाठक के विश्‍वसनीय अनुभवों को पिरोया भी। उनकी यथार्थवादी दृष्टि उनके प्रगतिशील व मार्क्सवादी विचारों का प्रतिफल थी। भीष्म जी की सबसे बड़ी विशेषता थी कि उन्होंने जिस जीवन को जिया, जिन संघर्षो को झेला, उसी का यथावत चित्र अपनी रचनाओं में अंकित किया। इसी कारण उनके लिए रचना कर्म और जीवन धर्म में अभेद था।

भीष्म साहनी के उपन्यासों में शोषणहीन, समतामूलक प्रगतिशील समाज की रचना, पारिवारिक स्तर, रूढ़ियों का विरोध तथा संयुक्त परिवार के पारस्परिक विघटन की स्थितियों के प्रति असंतोष व्यक्त हुआ है। उन्‍होंने अपनी कहानियों में हाशिए के लोगों - स्‍त्री, मजदूर, घरेलू नौकर आदि की यंत्रणाओं को मार्मिक रूप में प्रस्‍तुत किया है। उन्‍होंने उपेक्षित जनसमूहों में आ रही जागरूकता, स्‍वाभिमान की चेतना तथा अस्तित्‍व बोध को भी प्रभावशाली ढंग से दर्शाया। भीष्म साहनी ने स्‍त्री चेतना तथा स्‍त्री-पुरुष संबंधों को भी अपनी रचनाओं का विषय बनाया। उनका विश्वास था कि स्त्रियों के लिए समुचित शिक्षा, आर्थिक स्वतंत्रता व व्यक्तित्व विकास की सुविधा आदर्श समाज की रचना के लिए नितांत आवश्यक है। वे स्त्रियों के व्यक्तित्व विकास के पक्षधर थे, जो अवसर पाकर अपना चरम विकास कर सकती है। भीष्म जी परंपरा से चली आ रही विवाह की जड़ परंपरा को स्वीकार न करके भावनात्मक एकता और रागात्मक अनुबंधों को विवाह का प्रमुख आधार मानते थे। स्‍त्री-पुरुषों संबंधों एवं स्‍त्री की अधीनता को चित्रित करते हुए उन्‍होंने अत्‍यंत सूक्ष्‍मता से उसमें अंतर्निहित आर्थिक भूमिका को भी रेखांकित किया। उन्‍होंने स्त्रियों के प्रति विषमतामूलक, अन्‍यायपरक एवं अलोकतांत्रिक प्रवृत्तियों को पराजित करने वाले तत्‍वों को सहानुभूति के साथ उभारा। उनके यहाँ स्‍त्री का संघर्ष उनकी लेखकीय संवेदनशीलता के कारण जीवंत हो उठता है। वे पुरुष द्वारा स्‍त्री के भावनात्‍मक शोषण के साथ स्त्रियों की आपसी कटुता एवं शत्रु भावना का भी मनोयोग से चित्रण करते हैं।

भीष्म साहनी के उपन्यासों के स्त्री पात्र भी इन्हीं सामाजिक संबंधों की जटिलताओं और विरोधाभासों को प्रस्तुत करते हैं। साहनी जी अपने स्त्री पात्रों की स्वतंत्रता, चेतना को अपने समकालीन लेखकों की अपेक्षा ज्यादा संवेदनशीलता और गहराई से उभारते हैं। उनकी रचनाओं में स्त्री के कई रूपों का वर्णन मिलता है जिसमें मुख्य हैं : भारतीय नारी के आदर्शों को स्थापित करती 'परंपरागत स्त्री', समाज सुधार आंदोलनों से प्रभावित 'प्रगतिशील स्त्री', जीवन की कठिनाइयों को झेलती 'पीड़ित स्त्री' और स्थापित व्यवस्था के प्रति प्रतिरोध दर्ज करती 'विद्रोही स्त्री'। उदाहरण के लिए हम भीष्‍म साहनी रचित नाटक 'माधवी' को लेते हैं। माधवी की कथा दो भिन्‍न परिदृश्‍यों में हमारे सामने आती है। पहली बार तब जब वह राजा ययाति के समक्ष अर्जित 'पुण्‍य' लेकर प्रस्‍तुत होती है। ययाति के स्वर्ग से निष्‍कासन के उपरांत वे पृथ्‍वी एवं स्‍वर्ग के मध्‍य अटके हुए होते हैं। राजा एवं क्षत्रिय होने के कारण वे दूसरों से दान नहीं ले सकते। तब उन चार चक्रवर्ती सम्राटों द्वारा राजा ययाति को सपर्पित 'पुण्‍य' को न्‍यायसंगत बताते हुए माधवी उन्‍हें यह विश्‍वास दिलाती है कि ये चारों राजा उनके दौहित्र हैं। उसके उपरांत वे उसके पुत्रों की सहायता लेने को तैयार होते हैं। महाभारत के 'आदि पर्व' में राजा ययाति के संपूर्ण लौकिक जीवन के वर्णन के क्रम में छिटपुट तरीके से माधवी का भी वर्णन मिलता है।

माधवी की कथा को अधिक विस्‍तार महाभारत के 'उद्योग पर्व' में मिलता है। जब 'गालव' का प्रसंग सामने आता है। इस पर्व में मनुष्‍य के 'अभिमान' के त्रासद अंत को दुर्योधन में माध्‍यम से सामने लाते हुए नारद मुनि गालव की कथा को भी शामिल करते हैं। उसमें वे माधवी को दान में दिए जाने के प्रसंग का भी जिक्र करते हैं। यह कथा ययाति के दान प्रसंग के बिना शुरू नहीं हो सकती जिसमें वे अपनी पुत्री 'माधवी' को गालव को दान में देते हुए उसे आश्‍वस्‍त करते हैं कि उसके माध्‍यम से गालव अपने गुरु विश्‍वमित्र की गुरुदक्षिणा चुका कर अपनी कर्तव्‍यपरायणता की मिसाल पेश कर सकता है। अपनी कन्‍या को दान देते समय ययाति गालव का ध्‍यान उसके दो अति महत्‍वपूर्ण गुणों के प्रति आकर्षित करते हैं। प्रथमतः उसमें चक्रवर्ती सम्राट को पैदा करने का विलक्षण गुण है। द्वितीयतः उसे चिर कौमार्य का वरदान प्राप्‍त है। उसके उपरांत गालव द्वारा आठ सौ अश्‍वमेधी घोड़ों के लिए माधवी को, तीन राजाओं तथा विश्‍वमित्र के पास भेजा जाता है। अंततः गालव अपनी गुरु दक्षिणा के प्रण को पूरा करता है। इस प्रकार ययाति के यश की रक्षा, गालव के असंभव प्रण की रक्षा तथा विश्‍वमित्र के गुरु अहंकार की रक्षा होती है। हर पात्र के लिए माधवी की उपस्थिति अनिवार्य शर्त है।

भीष्‍म साहनी इस कथानक को अपनी सर्जनात्‍मक एवं वैचारिक अभिव्‍यक्ति प्रदान करते हुए 'माधवी' को एक मुखर स्‍वर के रूप में प्रस्‍तुत करते हैं जो अपनी जीवन परिस्थितियों को कभी पिता, कभी प्रेमी और कभी राजाओं के आदेश स्वीकार तो करती है परंतु, उसके साथ घटित हो रही स्थितियों के प्रति वह पूर्णतः सजग है। वह स्‍त्री की अपनी नियति के प्रति विक्षोभ की चरम स्थिति में भी मौन रहने की बजाय कभी दुखी होकर, कभी खुश होकर, कभी उसके साथ हो रहे विश्‍वासघात के प्रति क्षुब्‍ध होकर तो कभी अत्‍यंत व्‍यंग्‍यात्‍मक लहजे में अपना प्रतिरोध दर्ज करती है। बेशक, भीष्‍म साहनी का मूल्‍यांकन करते हुए यह आरोप लगाया जा सकता है कि उनके स्‍त्री पात्र जोरदार तरीके से आक्रोशित लहजे में अपने साथ हो रहे अन्‍याय के प्रति आवाज नहीं उठाते, पर यह भी उतना ही सत्‍य है कि उनके स्‍त्री पात्र अत्‍यंत मद्धिम स्‍वर में भी इस व्‍यवस्‍था के प्रति अपना सशक्‍त प्रतिरोध दर्ज करते हैं। बेशक वे काल्‍पनिक या नाटकीय तरीके से चीखते-चिल्लाते नहीं। भीष्‍म साहनी अत्यंत यथार्थवादी तरीके से स्त्रियों की सामाजिक स्थिति से हमारा परिचय कराते हैं। 'माधवी' नाटक में राजा ययाति द्वारा माधवी को दान में दे दिए जाने के उपरांत माधवी अपने पिता से विस्‍फारित नेत्रो से प्रश्न पूछती है - ''आज माँ होती तो क्‍या वह मुझे इस तरह दान में दे देती!' ययाति प्रत्‍युत्‍तर देते हैं - ''इस समय मेरा धर्म ही सर्वोपरि है माधवी'' इस प्रसंग में भीष्‍म साहनी स्त्रियों को 'वस्‍तु' समझे जाने की सामाजिक मानसिकता को पाठकों के समक्ष प्रस्‍तुत करते हैं। 'दान देने' की बात के प्रति माधवी की पहली प्रतिक्रिया ही इस नाटक के स्‍त्रीवादी पक्ष का प्रस्‍थान बिंदु है। किंतु नारीवादी विमर्श की एक समस्‍या स्‍वयं यहाँ भीष्‍म साहनी से भी है कि क्‍या माँ होती भी तो वह बेटी को दान कर दिए जाने के राजा ययाति के निर्णय के विरुद्ध चली जाती? क्‍या इस समाज में स्त्रियों को इतना अधिकार प्राप्‍त है कि वे अपनी संतानों के भविष्‍य का निर्णय स्‍वंतत्र रूप से ले सकें, वह भी तब जब इस पितृसत्‍ता की संरचना में ही पुत्रियों को दान में दे देना शास्‍त्रसम्मत हो। ऐसी स्थिति में, अपने पति के यश, प्रतिष्ठा एवं उसकी दानवीरता की महत्वाकांक्षा के सामने कोई पत्‍नी अपनी पुत्री को दान में दिए जाने का प्रतिरोध करे, यह प्रश्‍न बेमानी ही प्रतीत होता है। बावजूद इसके, माधवी का यह पहला प्रतिरोध है जिसके माध्‍यम सें वह पुरुषों की दुनिया में दाखिल होती है।

रचना का स्त्रीवादी पाठ

भीष्म साहनी की नाट्य रचना माधवी के आगे बढ़ने के क्रम में नायिका (माधवी) की मासूमियत खत्‍म होती जाती है एवं जीवन उसे स्‍त्री-पुरुष संबंधों को समझने के नित नए पाठ पढ़ाता है। अपने पिता ययाति के कर्तव्‍य तथा धर्म की आड़ में किए गए उनके कृत्‍य के पीछे उसे उनका अभिमानी (दंभी) तथा यशलोलुप व्‍यक्तित्‍व नजर आता है। गालव की गुरुदक्षिणा चुका देने की घमंडी मानसिकता नजर आती है। सभी राजाओं के पास रहते हुए उसका सामना एक ऐसे घृणित पुरुष समाज सें होता है जो पुत्र के रूप में चक्रवर्ती सम्राट पाने के लिए शुल्क के रूप में छ सौ अश्‍वमेधी घोड़ों का भुगतान करते हैं। अंत में, उसका साहचर्य विश्‍वमित्र नामक महान ऋषि माने जाने वाले एक अत्‍यंत लोलुप, अहंकारी एवं यश के लिए भूखे पुरुष से होता है। यह यात्रा माधवी के मन में पुरुषवादी समाज के कलुषित चेहरे को हमेशा के लिए अंकित कर देती है जो स्‍त्री को सिवाय शरीर और अपने लक्ष्‍यों की पूर्ति के माध्‍यम के अतिरिक्‍त कोई स्‍थान नहीं देता।

अपनी यात्रा के अंतिम पड़ाव में उसे यह महसूस होता है कि गालव जो उसका प्रेमी भी है, उसकी रुचि माधवी के अस्तित्‍व के नैतिक पक्ष में नहीं, बल्कि उसकी उत्‍कंठा इस बात में है कि यदि माधवी तपस्या करके पुनः कौमार्य से परिपूर्ण एक सुंदर युवती का रूप ग्रहण कर ले तो वह उससे अवश्य विवाह कर लेगा। माधवी का भ्रम एक बार पुनः खंडित होता है जब वह गालव के विचारों से अवगत होती है। उसे पूरा विश्‍वास था कि गालव अपने गुरु की दक्षिणा चुका लेने के उपरांत उसके साथ सहर्ष विवाह करेगा। उसकी मुक्ति का स्वप्न दरअसल उसके प्रेम के साथ जुड़ा हुआ स्‍वप्‍न है। परंतु अंततः उसे यह भान होता है कि उसकी परिस्थिति में रह रही किसी भी स्‍त्री के लिए प्रेम शोषण का दूसरा नाम है। इसलिए वह अपनी मुक्ति प्रेम में नहीं, अपितु पुरुष के प्रेम की जकड़बंदी को 'अस्वीकार' करने में तलाशती है।

इस मि‍थकीय कथा को नाटक में तब्‍दील करके भीष्‍म जी ने एक तार्किक, समकालीन एवं जेंडर संवेदनशील दृष्टि का परिचय दिया और माधवी जैसा अभिव्यक्तिपरक पात्र भी सृजित किया। उन्होंने माधवी को एक नई पहचान दी जो न तो माता से संबद्ध है और न ही बच्चों से। यह नाटक उन सभी रिक्त स्थानों की पूर्ति करता है जो खाली छोड़ दिए गए हैं। उनकी दृष्टि से यह सर्वाधिक व्‍यथित करने वाली बात थी कि माधवी जैसे स्‍त्री पात्र के लिए जो एक आज्ञाकारी एवं कर्तव्‍यपरायण लड़की है, जो अपने पिता की आज्ञा की अवहेलना की कल्‍पना तक नहीं कर सकती, पूरी महाभारत की कथा में इस पात्र के लिए सहानुभूति का एक शब्‍द भी नहीं था। परंपरा में ढली, पितृसत्ता के साए में पली बेटी के लिए इस प्रकार की उपेक्षा!

महाभारत के उद्योग पर्व में माधवी को जहाँ शांत कराया गया है वहीं साहनी जी ने उसे एक विशिष्ट व्यंग्यात्मक लहजे में मुखर ध्वनि दी है। जब अयोध्या नरेश के दरबार में राज ज्योतिषी उसकी वाक परीक्षा लेने के लिए उसे कुछ बोलने को कहते हैं तो उसका यह बोलना कि - "यह क्या है गालव? तुम मुझे कहाँ ले आए? मैंने ऐसी कौन सी भूल कर दी जिसकी सजा तुम मुझे दे रहे हो?" एक इनसान को एक वस्‍तु में बदल देने का प्रतिरोध माधवी आरंभ से ही करती है। वह गालव की प्रतिज्ञा पूर्ति और पिता की धर्म रक्षा के लिए तीन राजाओं को पुत्र प्रदान करती है। गालव द्वारा माधवी के हर पुत्र प्रेम को स्त्रैण कमजोरी के रूप में देखा जाना पुरुष सत्तात्मक सोच का परिचायक है जब वह माधवी को संबोधित करता हुआ कहता है - "मैं नहीं जानता कि बच्चे को जन्म देने के उपरांत तुम इतनी कमजोर क्यों हो जाती हो? अब मैं समझ गया हूँ कि स्त्रियाँ क्यों किसी गंभीर कार्य के लिए जिम्मेवार नहीं मानी जाती हैं।"

गालव के इस वाक्य से उसमें मौजूद स्वामित्व की भावना एवं पितृसत्तात्मक दंभ की झलक मिलती है। माधवी को उसके द्वारा बेहद कमजोर और स्त्रैण घोषित कर दिया जाता है जिसे सभी पुरुष अपने धर्म और कर्तव्य को पूरा करने के लिए शोषित करते हैं। यह कड़वा सबक उसे उन पुरुषों से सीखने को मिलता है जिनके लिए वह बहुत ही दुखी होकर कहती है - "मेरा कर्तव्य मेरे पिता और गालव के लिए है। दोनों ही मेरे माध्यम से अपने धर्म का निर्वाह कर रहे हैं। इसलिए मैं कमजोर हूँ और वे कर्तव्यपरायण। मेरे पिता ने अपने कर्तव्य पालन के लुए मुझे गालव को दान कर दिया और गालव ने अश्व प्राप्ति के लिए किसी अन्य राजा को।"

इस कथा का यह पक्ष वर्तमान समय में सेरोगेसी से भी जुड़ा हुआ है। जहाँ हर बार वह अपनी कोख किराए पर देती है। परंतु किराए की अर्जित संपत्ति में उसकी कोई हिस्‍सेदारी नहीं होती। एक तरह से माधवी गालव के लिए मुफ्त श्रम की तरह है। एक ऐसा दास जिसे बेमोल खरीदा गया और जिस पर कोई धन भी खर्च नहीं किया गया। यही नहीं, बच्चे से बिछुड़ी माँ के दुख की समानता वह अपने दुख से करता है। गालव का दुख माधवी की यौनिक पवित्रता से जुड़ा है जो उसकी पुरुषवादी परंपरागत अवधारणा से जुड़ा हुआ है। माधवी की चारित्रिक विडंबना और उसके मन के दर्द को कौन समझ सकता था? अपने दुधमुँहे शिशुओं को छोड़कर वह आगे बढ़ती जाती है। उसका सौदा संपूर्ण नारी अस्मिता का सौदा बना। नाटककार ने पूरी ईमानदारी व निष्ठा के साथ यही उकेरा है कि युगों के पर्दे गिरते गए पर विश्व रूपी रंगमंच में नारी का अस्तित्व मात्र वस्तु के रूप में बना रहा। एक हाड़-मांस की भोग्या वस्तु। माधवी नाटक ने युगों से चली आ रही शोषण की इस परंपरा पर कसकर तमाचा मारा है। नारी का उपयोग और उपभोग शायद पालतू जानवरों से भी बदतर तरीके से किया गया है। माधवी नाटक में आर्तनाद करती हुई कहती है - "एक कर्तव्य मेरे पिता का, एक कर्तव्य मुनिकुमार गालव का, दोनों के कर्तव्य मेरे माध्यम से पूरे हो रहे हैं। फिर भी मैं दुर्बल हूँ, कर्तव्यपरायण वही हैं। पिता ने मुझे सौंपकर अपना कर्तव्य निभा दिया, और मुनिकुमार ने घोड़े बटोरकर अपना कर्तव्य पूरा कर दिया। एक दानवीर बन गया, दूसरा आदर्श शिष्य, और माधवी?"

प्रेम समानता के मूल्यों पर टिका होता है, परंतु प्रश्न यह है कि क्या माधवी एवं गालव का प्रेम समानता आधारित है? इस कथा के पूरे वितान में गालव माधवी के प्रेम का आडंबर तैयार करने के बावजूद यह शोषक-शोषित की कथा बनकर रह जाती है। इस नाटक का अंत अत्‍यंत महत्‍वपूर्ण हो जाता है। गालव माधवी के जर्जर पड़े शरीर एवं ढलते यौवन को देखकर विचलित हो उठता है। ऐसे में माधवी का पुनः अनुष्ठान करके चिर कौमार्य ना अपनाने का निश्चय गालव को अंदर तक हिलाकर रख देता है। इस संबंध में माधवी के अपने तर्क हैं। वह अनुष्ठान न करके गालव के प्रेम की परीक्षा करती है और गुरुदक्षिणा से मुक्त हो चुके उतीर्ण गालव को अनुतीर्ण घोषित करती है। स्त्री की अधीनता की पड़ताल करने वाली प्रारंभिक नारीवादी चिंतक मेरी वुल्सनक्राफ्ट के तर्कों को मानती है - "पूर्व धारणाओं की विनम्र दास बनने की बजाए तर्क की सत्ता के समक्ष झुका जाए और पुरुषों के साथ सुंदर और प्रीतिकर छवि में ही न बँधा जाए।"

वह गालव के छद्म प्रेम का पर्दाफाश करती है। भीष्‍म साहनी माधवी के मुख से समाज में मौजूद पितृसत्ता के दोहरे मानदंडों एवं स्‍त्री यौनिकता के प्रति समाज में विद्यमान शुचिता की धारणाओं का प्रतिरोध करते हैं। माधवी के प्रश्‍न दरअसल गालव से नहीं, बल्कि पूरे समाज से है। अंत में गालव को मुक्त करने की बात करते हुए वह स्वयं को ही मुक्त करती है। प्रेम, मर्यादा और पितृसत्ता की कैद से...।

दरअसल 'माधवी' स्त्री परतंत्रता की पड़ताल करने वाला नाटक है। माधवी की कथावस्तु अपनी पौराणिकता के बावजूद स्त्री-पुरुष संबंधों को आधुनिक संदर्भों में परिभाषित करती है। यह कृति स्पष्ट तौर पर भारतीय समाज में स्त्री की तथाकथित उपस्थिति और प्रयोजित नियति पर गहरा कटाक्ष करने वाली नाट्य कृति है। भीष्म जी ने बिना मुखर हुए पुराणेतिहास में वर्णित इस अभिशप्त नारी को वर्तमान परिप्रेक्ष्य से जोड़ा और उसकी पात्रता से जुड़ी अनकही वेदना और उस युग की विसंगतियों एवं धार्मिक विडंबनाओं को देखने का प्रयास किया। इस नाटक के जरिए भीष्म साहनी ने यह दर्शाने का प्रयास किया कि किस प्रकार एक स्त्री राज्य, धर्म, परिवार एवं प्यार द्वारा बार-बार छली जाती है और खुद को पूरी तरह समर्पित कर देने के बावजूद उसका कुछ भी नहीं है। यह स्थिति उस स्त्री की है जो एक अत्यंत प्रतिष्ठित राजा ययाति की पुत्री है, सुंदर है और सबसे बढ़कर उसमें चक्रवर्ती सम्राट को जन्म देने की क्षमता है। ऐसे में एक साधारण स्त्री की इस समाज में क्या स्थिति हो सकती है, इसे स्वतः समझा जा सकता है।

इस नाटक में साहनी जी ने माधवी को मौन नहीं रखा है बल्कि उसे अभिव्यक्ति दी है। उन्होंने उन बेड़ियों की पहचान कराई है जिनमें एक स्त्री बँध कर रह जाती है और हमारा समाज उसका पूरा दोहन करता है। इन सबसे निरपेक्ष हुए बिना एवं अपनी अस्मिता के प्रति चेतनाशील हुए बिना स्त्री मुक्ति संभव ही नहीं। अपने इसी स्थापना के साथ, भीष्म साहनी नारीवादी आंदोलनों एवं स्त्रीवादी विमर्शों के प्रति अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता जाहिर करते हैं। अंतत माधवी इस कथा को अत्‍यंत विचारणीय बनाती है। जो अपनी तह में डूबे कई विरोधायासों तथा अनहुए पहलुओं को उजागर करती है और वैचारिक तौर पर पाठकों को हिंसा, सत्‍ता तथा सत्‍यक, मूल्‍य तथा नैतिकता के पाखंड तले छिपे दंभ, लोलुपता एवं दोहरेपन से रूबरू कराती है। लगभग पुरुष द्वारा व्‍याख्‍यायित हर सत्‍य तथा नैतिक उपलब्धि किसी शांत - मौन करा दी गई स्‍त्री के धैर्य पर निर्भर करता है। उनकी उपस्थिति के बिना किसी भी पितृसत्तात्‍मक पौराणिक महाआख्यान की रचना संभव नहीं। अर्थात भौतिक अर्थो में 'स्त्री प्रकार्थ' का दूसरा नाम है। यह नाटक इस विषमतामूलक समाज में जो स्त्रियों की पुनरुत्पादन क्ष्‍ामता, यौनिकता तथा यौनिक आकांक्षाओं को अपनी मंशानुसार गढ़ता है, उससे मुक्ति दिलाने का एक उपक्रम है। जेंडर एक सामाजिक सरंचना है। अतः नारीवादी विमर्श का यह दायित्‍व है कि वह साहित्‍य में रचित उन महत्‍वपूर्ण रचनाओं और रचनाकारों को स्‍त्री मुक्ति की उस मुहिम में शामिल करें जो अन्‍याय तथा शोषण के विरुद्ध अपनी सृजनात्‍मक अभिव्‍यक्ति दे रहे हैं। भीष्‍म साहनी ने लगभग अपनी सभी रचनाओं में अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता की छाप छोड़ी है। उनका उपन्‍यास 'बसंती' भी पितृसत्‍ता के विरुद्ध एक सशक्‍त कृति है।


End Text   End Text    End Text

हिंदी समय में सुप्रिया पाठक की रचनाएँ